जागृत युवा....
मैं एक जागृत भारतीय युवा हूँ. मेरी उम्र अभी इतनी ज्यादा नहीं कि मैं हालातों के सामने हार मान लूं, और ना ही मेरी उम्र इतनी कम है कि मैं मेरी अपनी धरती पे जो भी कुछ हो रहा है उसको स्वीकार कर लूं. मैंने आत्म संघर्ष किया है, वर्षों वर्षों तक मैं सिर्फ एक ही बात पर यकीन करता था कि मैं अपना भविष्य अपने कठिन परिश्रम से रचूंगा. मेरी इस भावना ने मुझे बहुत ही आशावादी बनाया है और मैंने कठिन परिश्रम भी किया है. मैंने कठिन परिश्रम किया और देश के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान से सिक्षा प्राप्त की और आज मैं अमेरिका में एक सुखद ज़िन्दगी जी रहा हूँ. मैं सुखी हूँ, मैं खुश हूँ, क्या यह सब काफी है? मुझे इस बात का भली भांति आभास है कि मैंने अपनी पढाई के लिए जिस प्रतियोगिता पे सफलता पाई उस प्रतियोगिता मैं करीब ३ लाख से भी ज्यादा उम्मीदवार थे. करीब ६-७ हज़ार सफल हुए, पर बाकी का क्या? क्या मेरा देश उन ६-७ हज़ार लोगो से चलेगा? अगर हम अपने देश के आंकड़े देखें तो हर साल लाखों युवा नौकरी तलाश करते हैं. पर जो कार्य हमारे देश मैं हो रहा है वह अधिकांशतः विदेशों से मिल रहा कार्य है, जो कार्य सिर्फ उन ६-७ हज़ार लोगों को मिलता है , जो कि मूल प्रतिस्पर्धा में सफल थे. अब प्रश्न यह है कि हम अपने बाकी के युवा वर्ग के साथ क्या कर रहे हैं? हम अपने मानव संसाधन कि ऊर्जा को सही दिशा में निवेश कर रहे हैं क्या? इन दोनों प्रश्नों का एक नकारात्मक उत्तर है, हम अपनी युवा शक्ति को बर्बाद कर रहे हैं.
सर्वप्रथम हम आज के युग में इस सोच से जी रहे हैं, जिसके हिसाब से मात्र ६-७ हज़ार लोग, जो समाज कि नज़रों में सफल हैं, सिर्फ उन लोगों का जीवन बहुमूल्य है, बाकी सबका ब्यर्थ. हमारे माता पिता से लेकर समाज का हर कोई इंसान हमारी इज्ज़त नहीं करता, उसका मूल यह है कि हम उन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं हो सके. गंभीर बात सोचने कि यह है कि हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ पे हमारी संस्कृति हर व्यक्ति के भीतर व्याप्त 'संस्थान' की खोज हमारे जीवन का मूल्य समझती है, पर हम इस बात को भूलकर, आज के समय में बहार के लोगों कि सोच पर अपना जीवन जीते हैं. यह दुविधा जो हमारे दिमाग में झूल रही है, येही दुविधा हमारे भीतर के ईश्वर को, जो कि प्राकृतिक रूप से रचनात्मक है, रचना नहीं करने देता. क्या IIT , MIT , Harvard , AIIMS खुद से बने थे? नहीं, इन सब संस्थानों का निर्माण व्यक्तियों के भीतर के 'संस्थानों' ने किया था. यह सारे संस्थान देशों के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन संस्थानों का महत्व इसलिए है कि यह समाज कि सेवा करें और हर व्यक्ति को अपने भीतर के 'संस्थान' को पहचानने का मार्ग दिखायें.
यह निराशावादी भावना हमारे भीतर आती कैसे है. इसका मूल हमारे देश कि सरकार है. सरकार का कर्तव्य है कि देश के जनहित में कार्य करे. अपनी योजनायें ऐसी बनाए जिससे देश में हर परिवार को रोजगार मिले. युवाओं को ऐसे अवसर मिलें जो कि उनको नव कार्यों के लिए उत्साहित करें. आखिर यह संस्थाएं क्या हैं? आखिर यह घर, यह महल, यह सडकें, यह हथियार, यह कंप्यूटर, कुछ भी जिसे हम आज इस्तेमाल करते हैं, यह सब कहाँ से आया है? यह सब मानव रचना का ही परिणाम है. बस अवसर मिलने चाहिए. और जब से हमारा देश स्वतंत्र हुआ है, कुछ सरकारों को छोड़कर, जिन्होंने पिछले ६५ सालों में से सिर्फ ५-१० साल सरकार चलायी, बाकी सरकारों ने देश को लूटा है. हम कहते हैं कि हम एक प्रजातंत्र हैं. लेकिन प्रजातंत्र में जब भी नागरिकों ने आवाज उठाई, उस आवाज को दबाने का प्रयत्न हुआ है. आखिर यह देश हमारा है, लेकिन इस देश को सिर्फ एक परिवार, नेहरु परिवार, चला रहा है. यह कहाँ का प्रजातंत्र है? हमारे देश को यह बात समझने में इतना समय क्यूँ लग रहा है? इसकी वजह है हमारी पिछले १००० सालों कि गुलामी. जिसने हमें अपने सही मार्ग से विचलित कर दिया है. हम अपने भीतर के 'संस्थान' को पहचान नहीं रहे हैं.
राहुल गाँधी, जो कि इस बात का दंभ भरते हैं कि उनकी पार्टी में उम्मीदवार प्रजातान्त्रिक रूप से चुने जाते हैं, आखिर राहुल गाँधी ने कब स्वयं प्रजातान्त्रिक रूप से अपनी खुद की जगह पार्टी में बनायीं है? सच यह है कि राहुल, नेहरु परिवार के वारिस हैं. यह कहाँ का न्याय है कि हम कठिन परिश्रम करें और हमारा कठिन परिश्रम का फल नेहरु परिवार और उनके चापलूस ले जाएँ. आखी 2G घोटाले का पैसा कहाँ गया? ऐसा कैसे संभव है कि किसी भी सरकार में १.७६ लाख करोड़ रुपये सिर्फ एक टेलिकॉम मंत्री खा जाए. इस घोटाले में ऊपर से नीचे तक, सरकार का हर व्यक्ति शामिल है. चिदंबरम ने जरूर Harvard से MBA किया है और उन्हें इस बात का घमंड भी है, पर क्या सिक्षा सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के हित मात्र के लिए होती है? क्यूँ करदाता का पैसा इन संस्थानों में खर्चा होता है अगर इन संस्थानों से पढ़ने वाले लोग समाज को लूटने का काम करते हैं?
शायद हमारी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण ३०-४० वर्ष देश को बनाने में बीत जाएँ. और मुझे इस बात का भी आभास है कि यह ३०-४० वर्ष हमारे जीवन के ५०% वर्ष हैं. पर हमारा देश जो कि सिर्फ भूमि, नदी, शहर या जंगल नहीं है, अपितु एक स्वतंत्र सोच है, उसके लिए हमारे समर्पित ३०-४० वर्ष हमारे जीवन को धन्य करेंगे. यह सब होगा कैसे? अब समय आ गया है अपने देश को खुद के हाथों में लेने का. अब समय आ गया है अपने देश में परिवर्तन लाने का. हम अपने लिए नए सिक्षा के संस्थान बनायेंगे. जिस देश ने दुनियां को पहला विश्वविद्यालय दिया था, वह देश सिक्षा का फिर से केंद्र बनेगा. हमारा देश विश्व शांति के लिए महत्वपूर्ण है, अतः हमें ऐसी सरकार बनानी है जो कि प्रजा की बात को सर्वोपरि रखे और विश्वहित में कार्यरत रहे. हमें परिवर्तन चाहिए. और अब हम , जिन्होंने हमें पिछले ५५ सालों में धोखा दिया है, उन्हें अपने देश कि बागडोर नहीं सौपेंगे.
उत्तिष्ठ भारत.
मैं एक जागृत भारतीय युवा हूँ. मेरी उम्र अभी इतनी ज्यादा नहीं कि मैं हालातों के सामने हार मान लूं, और ना ही मेरी उम्र इतनी कम है कि मैं मेरी अपनी धरती पे जो भी कुछ हो रहा है उसको स्वीकार कर लूं. मैंने आत्म संघर्ष किया है, वर्षों वर्षों तक मैं सिर्फ एक ही बात पर यकीन करता था कि मैं अपना भविष्य अपने कठिन परिश्रम से रचूंगा. मेरी इस भावना ने मुझे बहुत ही आशावादी बनाया है और मैंने कठिन परिश्रम भी किया है. मैंने कठिन परिश्रम किया और देश के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान से सिक्षा प्राप्त की और आज मैं अमेरिका में एक सुखद ज़िन्दगी जी रहा हूँ. मैं सुखी हूँ, मैं खुश हूँ, क्या यह सब काफी है? मुझे इस बात का भली भांति आभास है कि मैंने अपनी पढाई के लिए जिस प्रतियोगिता पे सफलता पाई उस प्रतियोगिता मैं करीब ३ लाख से भी ज्यादा उम्मीदवार थे. करीब ६-७ हज़ार सफल हुए, पर बाकी का क्या? क्या मेरा देश उन ६-७ हज़ार लोगो से चलेगा? अगर हम अपने देश के आंकड़े देखें तो हर साल लाखों युवा नौकरी तलाश करते हैं. पर जो कार्य हमारे देश मैं हो रहा है वह अधिकांशतः विदेशों से मिल रहा कार्य है, जो कार्य सिर्फ उन ६-७ हज़ार लोगों को मिलता है , जो कि मूल प्रतिस्पर्धा में सफल थे. अब प्रश्न यह है कि हम अपने बाकी के युवा वर्ग के साथ क्या कर रहे हैं? हम अपने मानव संसाधन कि ऊर्जा को सही दिशा में निवेश कर रहे हैं क्या? इन दोनों प्रश्नों का एक नकारात्मक उत्तर है, हम अपनी युवा शक्ति को बर्बाद कर रहे हैं.
सर्वप्रथम हम आज के युग में इस सोच से जी रहे हैं, जिसके हिसाब से मात्र ६-७ हज़ार लोग, जो समाज कि नज़रों में सफल हैं, सिर्फ उन लोगों का जीवन बहुमूल्य है, बाकी सबका ब्यर्थ. हमारे माता पिता से लेकर समाज का हर कोई इंसान हमारी इज्ज़त नहीं करता, उसका मूल यह है कि हम उन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं हो सके. गंभीर बात सोचने कि यह है कि हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ पे हमारी संस्कृति हर व्यक्ति के भीतर व्याप्त 'संस्थान' की खोज हमारे जीवन का मूल्य समझती है, पर हम इस बात को भूलकर, आज के समय में बहार के लोगों कि सोच पर अपना जीवन जीते हैं. यह दुविधा जो हमारे दिमाग में झूल रही है, येही दुविधा हमारे भीतर के ईश्वर को, जो कि प्राकृतिक रूप से रचनात्मक है, रचना नहीं करने देता. क्या IIT , MIT , Harvard , AIIMS खुद से बने थे? नहीं, इन सब संस्थानों का निर्माण व्यक्तियों के भीतर के 'संस्थानों' ने किया था. यह सारे संस्थान देशों के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन संस्थानों का महत्व इसलिए है कि यह समाज कि सेवा करें और हर व्यक्ति को अपने भीतर के 'संस्थान' को पहचानने का मार्ग दिखायें.
यह निराशावादी भावना हमारे भीतर आती कैसे है. इसका मूल हमारे देश कि सरकार है. सरकार का कर्तव्य है कि देश के जनहित में कार्य करे. अपनी योजनायें ऐसी बनाए जिससे देश में हर परिवार को रोजगार मिले. युवाओं को ऐसे अवसर मिलें जो कि उनको नव कार्यों के लिए उत्साहित करें. आखिर यह संस्थाएं क्या हैं? आखिर यह घर, यह महल, यह सडकें, यह हथियार, यह कंप्यूटर, कुछ भी जिसे हम आज इस्तेमाल करते हैं, यह सब कहाँ से आया है? यह सब मानव रचना का ही परिणाम है. बस अवसर मिलने चाहिए. और जब से हमारा देश स्वतंत्र हुआ है, कुछ सरकारों को छोड़कर, जिन्होंने पिछले ६५ सालों में से सिर्फ ५-१० साल सरकार चलायी, बाकी सरकारों ने देश को लूटा है. हम कहते हैं कि हम एक प्रजातंत्र हैं. लेकिन प्रजातंत्र में जब भी नागरिकों ने आवाज उठाई, उस आवाज को दबाने का प्रयत्न हुआ है. आखिर यह देश हमारा है, लेकिन इस देश को सिर्फ एक परिवार, नेहरु परिवार, चला रहा है. यह कहाँ का प्रजातंत्र है? हमारे देश को यह बात समझने में इतना समय क्यूँ लग रहा है? इसकी वजह है हमारी पिछले १००० सालों कि गुलामी. जिसने हमें अपने सही मार्ग से विचलित कर दिया है. हम अपने भीतर के 'संस्थान' को पहचान नहीं रहे हैं.
राहुल गाँधी, जो कि इस बात का दंभ भरते हैं कि उनकी पार्टी में उम्मीदवार प्रजातान्त्रिक रूप से चुने जाते हैं, आखिर राहुल गाँधी ने कब स्वयं प्रजातान्त्रिक रूप से अपनी खुद की जगह पार्टी में बनायीं है? सच यह है कि राहुल, नेहरु परिवार के वारिस हैं. यह कहाँ का न्याय है कि हम कठिन परिश्रम करें और हमारा कठिन परिश्रम का फल नेहरु परिवार और उनके चापलूस ले जाएँ. आखी 2G घोटाले का पैसा कहाँ गया? ऐसा कैसे संभव है कि किसी भी सरकार में १.७६ लाख करोड़ रुपये सिर्फ एक टेलिकॉम मंत्री खा जाए. इस घोटाले में ऊपर से नीचे तक, सरकार का हर व्यक्ति शामिल है. चिदंबरम ने जरूर Harvard से MBA किया है और उन्हें इस बात का घमंड भी है, पर क्या सिक्षा सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के हित मात्र के लिए होती है? क्यूँ करदाता का पैसा इन संस्थानों में खर्चा होता है अगर इन संस्थानों से पढ़ने वाले लोग समाज को लूटने का काम करते हैं?
शायद हमारी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण ३०-४० वर्ष देश को बनाने में बीत जाएँ. और मुझे इस बात का भी आभास है कि यह ३०-४० वर्ष हमारे जीवन के ५०% वर्ष हैं. पर हमारा देश जो कि सिर्फ भूमि, नदी, शहर या जंगल नहीं है, अपितु एक स्वतंत्र सोच है, उसके लिए हमारे समर्पित ३०-४० वर्ष हमारे जीवन को धन्य करेंगे. यह सब होगा कैसे? अब समय आ गया है अपने देश को खुद के हाथों में लेने का. अब समय आ गया है अपने देश में परिवर्तन लाने का. हम अपने लिए नए सिक्षा के संस्थान बनायेंगे. जिस देश ने दुनियां को पहला विश्वविद्यालय दिया था, वह देश सिक्षा का फिर से केंद्र बनेगा. हमारा देश विश्व शांति के लिए महत्वपूर्ण है, अतः हमें ऐसी सरकार बनानी है जो कि प्रजा की बात को सर्वोपरि रखे और विश्वहित में कार्यरत रहे. हमें परिवर्तन चाहिए. और अब हम , जिन्होंने हमें पिछले ५५ सालों में धोखा दिया है, उन्हें अपने देश कि बागडोर नहीं सौपेंगे.
उत्तिष्ठ भारत.